उत्तरकाशी: मखमली घास का विशाल मैदान, चारों ओर हिमालय की चोटियां और आसमान से बरसती बारिश की बूंदें…। करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर सोमवार को दयारा बुग्याल में लोक संस्कृति का ऐसा रंग बिखरा कि मौसम भी ग्रामीणों और पर्यटकों के उत्साह को नहीं रोक सका। सदियों पुरानी अढूंडी परंपरा में दूध, मक्खन और मट्ठे से होली खेली गई तो राधा-कृष्ण के नृत्य ने पर्व को आध्यात्मिक रंग दे दिया।
दयारा बुग्याल में आयोजित बटर फेस्टिवल में रैथल, नटीण, बंद्राणी, क्यार्क और भटवाड़ी गांवों के ग्रामीणों ने भाग लिया। लोकगीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच ग्रामीणों और देश-दुनिया से पहुंचे पर्यटकों ने एक-दूसरे पर दूध,मक्खन और मट्ठा डालकर अनूठी होली खेली। देव डोलियों और देव पश्वा ने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। श्रीकृष्ण और राधा के रूप में कलाकारों की प्रस्तुति भी आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही।
दयारा पर्यटन उत्सव समिति के अध्यक्ष मनोज राणा ने कहा किअढूंडी प्रकृति, पशुधन और लोक आस्था के प्रति ग्रामीणों की कृतज्ञता का अनूठा पर्व है। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण से पशुधन की समृद्धि और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की जाती है।
प्रकृति के प्रति आभार जताने का उत्सव
यह पर्व पशुपालन, प्रकृति और लोक आस्था के बीच सदियों पुराने रिश्ते का प्रतीक है। गर्मियों में रैथल समेत आसपास के गांवों के ग्रामीण मवेशियों के साथ बुग्याल की छानियों में पहुंचते हैं। मानसून के बाद गांव लौटने से पहले आभार जताया जाता है।
दो दशक से दुनियाभर में मिली पहचान
करीब 28 वर्ग किलोमीटर में फैला दयारा बुग्याल रैथल गांव से लगभग सात किलोमीटर पैदल दूरी पर है। भाद्रपद माह की संक्रांति के अगले दिन होने वाला यह पर्व पहले अढूंडी उत्सव के नाम से जाना जाता था, लेकिन दूध-मक्खन की होली के कारण पिछले करीब दो दशकों में इसे बटर फेस्टिवल के नाम से देशभर में पहचान मिली है।


