नई दिल्ली। हरिद्वार सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने संसद में उत्तराखंड समेत देशभर में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए हिंसक वन्यजीवों से मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने विशेष रूप से तेंदुए और बाघ जैसे वन्यजीवों की बढ़ती सक्रियता से ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पन्न खतरे और लोगों की आजीविका पर पड़ रहे प्रभाव को सदन के समक्ष रखा।
सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत के सवाल के लिखित उत्तर में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बताया कि मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की है। हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि ‘वन्यजीव पर्यावासों का विकास’ तथा ‘बाघ एवं हाथी परियोजना’ के अंतर्गत पिछले दो वर्षों के दौरान देशभर में लगभग 675.42 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की गई। इसमें उत्तराखंड को करीब 34.42 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।
सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और वन क्षेत्रों से सटे गांवों के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में तेंदुए और बाघ की सक्रियता के चलते ग्रामीणों में भय का माहौल रहता है। वन्यजीवों के हमलों से जहां मानव जीवन प्रभावित हो रहा है, वहीं खेती-बागवानी एवं पशुपालन जैसी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार से प्राप्त वित्तीय सहायता का प्रभावी उपयोग वन्यजीवों की निगरानी व्यवस्था मजबूत करने, संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त बढ़ाने, आधुनिक तकनीक एवं उपकरण उपलब्ध कराने तथा वन विभाग की क्षमता बढ़ाने में किया जा सकता है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को नियंत्रित करने और ग्रामीणों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
त्रिवेंद्र रावत ने कहा कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर निगरानी, त्वरित कार्रवाई और संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में प्रभावी सुरक्षा तंत्र को और मजबूत करना होगा।


